हमरक्स

मैं कलंदर बन के तेरी याद में
खो गया अपने दिल-ए-बर्बाद में
दिल को ऐसा सा लगा था प्यार में
कुछ बुरा होता नहीं संसार में

ज़िंदगी भर को मेरा हो जाएगा
फिर कभी ना दूर मुझसे जाएगा
कैसी नादानी का वह भी दौर था
तू हुआ जिसका वह कोई और था

प्यार था सौदा नहीं था प्यार का
मुझको था इक ग़म मेरे दिलदार का
तुझसे सीखी थी मुहब्बत की अदा
तुझसे पाया था मुहब्बत का मज़ा

तू मुझे भूले ना बस इतनी दुआ
ज़िंदगी भर हो यही बस सिलसिला
कुछ तेरी दुनिया का हिस्सा हो रहूं
रोज़ तेरा नाम ले कर सो रहूं

तू तेरे दीवानों में खोया रहे
यार की बाहों में तू सोया रहे
कौन सी सब से जुदाई माँग ली
कौन सी तुझसे खुदाई माँग ली

पर न तुझसे यह भी बन पाया ज़रा
मैं न तुझको याद तक आया ज़रा
आज तक तुझको नहीं मालूम यह
टूट कर बिखरा है दिल मज़लूम यह

अब खुशी से दिल बहुत घबराएगा
कोई चाहेगा तो दिल डर जाएगा
अब किन ही आँखों में खो ना पाएगा
अब कोई सपना संजो ना पाएगा
अब खुशी के मारे ना रो पाएगा
इस जनम में प्यार ना हो पाएगा

अब कोई हमदम नहीं दिल ढूंढता
अपनी खलवत में है महफ़िल ढूंढता
हमसफ़र जितने थे सब बेकार थे
जो मिले बस पल दो पल के यार थे
हमनवाई की तमन्ना भूल जा
आशनाई की तमन्ना भूल जा

मत लगा अए दिल किसी से आसरा
भूल जा दुनिया में कोई था तेरा
मुझको तन्हा छोड़ दे दुनिया में अब
मत बता मुझको जुदाई का सबब
याद मत करना की कोई था तेरा
आज से तू भी नहीं होगा मेरा

जो भी गुज़री थी वह शायद ख्वाब थे
नामुरादी के यही असबाब थे
मैं ही था नादान पड़ा जो प्यार में
बिक गया मैं इश्क़ के बेज़ार में

तेरी भी ग़लती का दिल इल्ज़ाम ले
किस तरह हिम्मत से अब दिल काम ले
सब से है मायूस किसका नाम ले
अए मेरे हमरक्स मुझको थाम ले
ज़िंदगी से भागकर आया हूँ मैं

Urdu Poetry has a very rich tradition of tazmeen – writing poetry using the verses of another poetry. The most common methods are either taking an entire ghazal and then adding a few lines before every couplet set in the same pattern or taking one couplet and writing an entire poem over it. Tazmeen is derived from the word zameen, which means earth, and hence implies building something on someone else’s ground.

Reading Fahmida Riaz‘s taazmeenAlam – e – Barzakh” on Ghalib‘s famous sher, or couplet, – Read Here – gave me the idea of writing one myself on one of my favourite couplets which were written by Noon Meem Rashid and is a part of his nazm, or poem, Raqs- Read Here.

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