हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल
मेरी मुश्किल पे मसखरी करता वह इनायत यही सही करता उसको मालूम भी नहीं होता और मैं उससे आशिक़ी करता हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल कोई हम पर भी शायरी करता
मेरी मुश्किल पे मसखरी करता वह इनायत यही सही करता उसको मालूम भी नहीं होता और मैं उससे आशिक़ी करता हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल कोई हम पर भी शायरी करता