मेरी मुश्किल पे मसखरी करता
वह इनायत यही सही करता
उसको मालूम भी नहीं होता
और मैं उससे आशिक़ी करता
हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल
कोई हम पर भी शायरी करता
सौंप देते उसी के कदमों में जाँ
जो भी करता सो बस वही करता
मैं उसे भूल जो कभी पाता
वह मुझे याद जो कभी करता
तेरी सूरत बना के चाँद भी अब
रोज़ हमसे है दिल्लगी करता
मैं हूँ वारिस तेरी जफ़ाओं का
इसलिए मैं जफा नहीं करता