कई इनसान मुझमें छिपते हैं
अपनी आदत से बाज़ आओ तुम इस क़दर प्यार मत लुटाओ तुम कई इनसान मुझमें छिपते हैं किस से मिलना है यह बताओ तुम याद तो रोज़ चली आती है भूले भटके ही चले आओ तुम
अपनी आदत से बाज़ आओ तुम इस क़दर प्यार मत लुटाओ तुम कई इनसान मुझमें छिपते हैं किस से मिलना है यह बताओ तुम याद तो रोज़ चली आती है भूले भटके ही चले आओ तुम
क्या बताऊँ कि मैं क्या से क्या हो गया इक तवायफ़ के पाज़ेब सा हो गया जिसको माना नहीं आज तक मर्द ने एक मजबूर औरत की ना हो गया
अपनी हद से गुज़र के देखूँगा अपनी किस्मत से लड़ के देखूँगा है मुहब्बत अदम की बरबादी फिर भी इक बार कर के देखूंगा
दुआ बाशक्ल सवाब ए जारिया खुदा करे कि नया साल इस क़दर गुज़रे मेरी पढ़ते हुए नमाज़ हर फजर गुजरे घनी जो छाँव तेरी रहमतों कि हो हम पर धूप का खौफ किसे हो जो यूं ज़ुहर गुजरे