अपनी हद से गुज़र के देखूँगा
अपनी किस्मत से लड़ के देखूँगा
है मुहब्बत अदम की बरबादी
फिर भी इक बार कर के देखूंगा
सब की खातिर तो जी के देख लिया
अपनी खातिर मैं मर के देखूंगा
अब भी किसके लिए यह बहता है
अपने ख़ूँ में उतर के देखूँगा
कैसे काटी यह ज़िन्दगी तुम बिन
वक़्त-ए-आखिर ठहर के देखूँगा
मुझसे बढ़कर भी तुम हो दुनिया में
नूर किसकी नज़र के देखूँगा
मुझको लूटा था जिन लुटेरों ने
थे वह किसके शहर के देखूँगा
हाय वारिस यह शायरी है क्या
इस झमेले में पड़ के देखूँगा