क्या से क्या हो गया

क्या बताऊँ कि मैं क्या से क्या हो गया
इक तवायफ़ के पाज़ेब सा हो गया

जिसको माना नहीं आज तक मर्द ने
एक मजबूर औरत की ना हो गया

इतने पैसे लगा कर महल तो बना
फिर भी सपनों का घर वो कहाँ हो गया

जिसको सींचा है दे कर के अपना लहू
क्या करोगे अगर बेवफा हो गया

है ये रिश्ता कि है फासला सा कोई
जो तेरे और मेरे दरमियाँ हो गया

अए खुदा वक़्त दे मेरी दुनिया है ये
तेरी दुनिया नहीं कुन कहा हो गया

चारागर खूब है सब को मरहम दिया
इक मेरा दाग़-ए-दिल चाँद सा हो गया

झूठ ने भी कहाँ कुछ बुरा कर लिया
और सच से भी किसका भला हो गया

जो कि वारिस किसी काम आया नहीं
तू भी ज़र्रा उसी खाक का हो गया

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