कई इनसान मुझमें छिपते हैं

अपनी आदत से बाज़ आओ तुम
इस क़दर प्यार मत लुटाओ तुम

कई इनसान मुझमें छिपते हैं
किस से मिलना है यह बताओ तुम

याद तो रोज़ चली आती है
भूले भटके ही चले आओ तुम

मैं भी आया था तेरे काम कभी
सिर्फ एहसान मत जताओ तुम

मैं भी रोने पे आज उतरा हूँ
जितना जी चाहे अब रुलाओ तुम

जो तेरे बिन गुज़ारता हूँ मैं
ज़िन्दगी वह भी कभी पाओ तुम

हमने जो गीत मिल के लिखा था
अब कभी गीत वो न गाओ तुम

अपनी दुनिया में रोशनी के लिए
एक मेरा ही दिल जलाओ तुम

दिल की सुनना नहीं कभी वारिस
चाहता है इसे मनाओ तुम

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