मैं क्यों लिक्खूँ?

quill

तुम कहते हो लिख लेने से दिल का कुछ ग़म घट जाएगा,
मेरा रोना सुनकर सुनने वालों का दिल फट जाएगा ।
तुम कहते हो लिख लेने से लम्बी रातें कट जाएंगी,
लंबी रातों का अंधियाला थोड़ा-थोड़ा छंट जाएगा ।
ये तुमसे किसने कहा मुझे अपना कुछ ग़म कम करना है ?
मेरे सीने के दाग़ों का कुछ मुझको मरहम करना है ?
किसने बतलाया है तुमको, लम्बी रातें कट जाती हैं ?
किसने बतलाया कि मुझको इस अन्धियाले को भरना है ?
तुमको क्या लगता है, क्या मैं, इस अन्धियाले से डरता हूँ ?
तुमने जब बात उठाई है तो प्रश्न तुम्ही से करता हूँ –
मैं क्यों लिक्खूँ?

तुम लिखते हो इस दुनिया को अपना चेहरा दिखलाने को ।
तुम लिखते हो भूली बिसरी बीती यादें दोहराने को ।
जो अब तक अपने अंदर ही घुट-घुट कर मरती आई है
उस क़िस्से को सारी दुनिया सुन ले, ऐसे बतलाने को ।
मेरा अपना इक चेहरा है, और मैं उस चेहरे जैसा हूँ,
भूली बिसरी यादों जैसा मैं बिल्कुल ऐसा-तैसा हूँ ।
मेरा ना कोई क़िस्सा है, ना दुनिया में कुछ हिस्सा है,
क्या बतलाऊँ, क्यूँ बतलाऊँ, मैं ऐसा हूँ मैं वैसा हूँ ?
तुम अपने जैसे बने रहो, मुझको खुद सा बन जाने दो,
बिन लिक्खे ही आना हो तो आए परिवर्तन आने दो ।
मैं क्यों लिक्खूँ?

दुनिया में दर्द बहुत है पर, क्या लिखने से कम होता है ?
क्या शब्दों से कोई भूखा कुछ भूख मिटाकर सोता है ?
क्या अलंकार से धरती का कुछ बोझ ज़रा घट जाता है ?
चाहे तुम जितना भी लिख लो, जो रोता था वो रोता है ।
लेखक बन कर क्या पाओगे ? लिखने से पेट नहीं पलटा ।
कविताओं से दिल भरता है, लेकिन घर कोई नहीं चलता ।
ग़ज़लें बस ख्वाब दिखाती हैं, पर नींद कहाँ दे पाती हैं,
बस इंक़लाब लिख लेने से अंतर का दीप नहीं जलता ।
वो जाने कैसे लोग जिन्हें दुनिया का दर्द मिटाना है ?
लिख लेने से क्या होता है, लिखने से क्या हो जाना है ?
मैं क्यों लिक्खूँ?

मंटो और फैज़ भी लिखते थे, बदलेंगे दुनिया, ये कहकर ।
साहिर फ़राज़ भी लिखते थे, इक ईश्क् के दरिया में बहकर ।
ग़ालिब इकबाल का लिखना तो ना जाने कैसा लिखना था !
मैं भी कुछ लिख लेता हूँ पर अपनी सीमाओं में रहकर ।
पर क्यूँ हदबंदी में जीना ? क्यूँ खुद पर पहरा कसना है ?
आखिर उनको तुमको मुझको दो ग़ज़ ज़मीन में बसना है ।
पन्नों में दफन नहीं होती हम इंसानों की तकदीरें,
पहले से लिक्खी आई हैं कब रोना है कब हँसना है ।
फिर क्यूँ लिख कर दिल तुड़वाना ? ऐसे ही मर जाना अच्छा ।
जब दुनिया से ना लड़ पाओ, तो खुद से लड़ जाना अच्छा ।
मैं क्यों लिक्खूँ?

Leave a comment