नई सड़क पे

नई सड़क पे पुराने मकाँ सा लगता हूँ
मैं टूटते हुए हिन्दोस्ताँ सा लगता हू

कल मैं लगता था जिसे सारे जहाँ से अच्छा
आज उस शख़्स को सारे जहाँ सा लगता हूँ

वो मेरा भाई था कल तक वो बहन थी मेरी
जिनको मैं आज किसी बद्-गुमाँ सा लगता हूँ

कल-तलक था मैं यहाँ की हवाओं में शामिल
आज सबको मैं यहाँ बेनिशाँ सा लगता हूँ

भजन लगूँ तो मुझे ज़हर दे दिया करना
क़त्ल कर देना अगर मैं अज़ाँ सा लगता हूँ

ज़मीन खून चुकाती है सब को दिखता है
मैं तो बेनाम लुटे आसमाँ सा लगता हूँ

हमें भी डर ने बनाया है झूट का आदी
मैं अपने आप की कटती ज़बाँ सा लगता हूँ

जिन परिंदों के घरोंदे हों टूटने वाले
उन्हें मैं पल-दो-पल के आशियाँ सा लगता हूँ

इस क़दर अम्न लुटा है कि जैसे दिल्ली हो
जिसकी बर्बादी की मैं दास्ताँ सा लगता हूँ

मेरी पहचान के ‘वारिस’ किये हैं दो टुकड़े
और इन टुकड़ों के मैं दरमियाँ सा लगता हूँ

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