वो तो खुश्बू है हवाओं में बिखर जाएगा
होके हमसाये-सबा जाने किधर जाएगा
मस’अला फूल का समझा था मगर ये पाया
आख़िरश फूल भी कांटो सा नज़र आएगा
ज़ख़्म का वस्फ़ है शह-रग में समा जाएगा
बनके फर्याद वो अल्लाह के घर जाएगा
मैंने चाहा था मेरा लम्हा वक़्त से टूटे
ये ना सोचा कि वो लम्हा भी गुज़र जाएगा
या तो उतरेगा मेरे सिर से ये बोतल का नशा
या तो बोतल में मेरा अक्स उतर जाएगा
सब्ज़ चेहरे में ज़र्द ज़िंदगी की मलबूसी
रू-ब-रू आएगा जो भी वोही डर जाएगा
सचबयानी का हुनर मुझमें नहीं है शायद
मेरे अन्दर छिपा शायर यूंही मर जाएगा
मुझको तहज़ीब के बरज़ख़् का बनाया वारिस
जुर्म ये भी मेरे अजदाद के सर जाएगा
बहुत खूब लिखा है आपने
धन्यवाद वर्मा जी 🙂