अब के बरस वतन का रहा हाल कुछ खराब
आए न साथ ले के नया साल कुछ खराब
दोज़ख़ में बैठ कर ये खयाल आए है अक्सर
शायद रहे हों अपने भी आमाल कुछ खराब
तुमने भी जवाबों में दिखाई थी बेरुखी
हमने भी किए तुमसे थे सवाल कुछ खराब
जिन के जलीस कल थे ज़माने के सहाफी
उन में शुमार होते हैं ज़ुह्हाल कुछ खराब
हमने भी नेकियों से रखा मोर कर है मुुँह
वो भी तो रहे दरिया में हैं डाल कुछ खराब
वारिस ज़रा तो उनकी किताबों से लो सबक
कहते नहीं थे ग़ालिब ओ इक़बाल कुछ खराब