मुकम्मल

है ये जानता अह्द-ए-हाज़िर मुकम्मल नहीं वक़्त पर कोई क़ादिर मुकम्मल हमारे तशख्खुस को क्या पूछते हो न कामिल मुसलमां न काफिर मुकम्मल

औक़ात ए खमसा

दुआ बाशक्ल सवाब ए जारिया खुदा करे कि नया साल इस क़दर गुज़रे मेरी पढ़ते हुए नमाज़ हर फजर गुजरे घनी जो छाँव तेरी रहमतों कि हो हम पर धूप का खौफ किसे हो जो यूं ज़ुहर गुजरे