वो बिगड़ता है तो बिगड़ जाए

वो बिगड़ता है तो बिगड़ जाए ये बता दे कि दिल किधर जाए मेरा दिल है गले का हार नहीं ज़रा सी चोट पे बिखर जाए ज़रा सा दर्द तो होगा लेकिन ये दुआ है कि दिल ठहर जाए

मुकम्मल

है ये जानता अह्द-ए-हाज़िर मुकम्मल नहीं वक़्त पर कोई क़ादिर मुकम्मल हमारे तशख्खुस को क्या पूछते हो न कामिल मुसलमां न काफिर मुकम्मल

अब के बरस

अब के बरस वतन का रहा हाल कुछ खराब आए न साथ ले के नया साल कुछ खराब दोज़ख़ में बैठ कर ये खयाल आए है अक्सर शायद रहे हों अपने भी आमाल कुछ खराब