नई सड़क पे
नई सड़क पे पुराने मकाँ सा लगता हूँ मैं टूटते हुए हिन्दोस्ताँ सा लगता हू कल मैं लगता था जिसे सारे जहाँ से अच्छा आज उस शख़्स को सारे जहाँ सा लगता हूँ
Urdu and Hindi Poetry written by me. The original Urdu or Hindi text has not been provided. Instead, transliteration has been given.
नई सड़क पे पुराने मकाँ सा लगता हूँ मैं टूटते हुए हिन्दोस्ताँ सा लगता हू कल मैं लगता था जिसे सारे जहाँ से अच्छा आज उस शख़्स को सारे जहाँ सा लगता हूँ
तुम कहते हो लिख लेने से दिल का कुछ ग़म घट जाएगा, मेरा रोना सुनकर सुनने वालों का दिल फट जाएगा । तुम कहते हो लिख लेने से लम्बी रातें कट जाएंगी, लंबी रातों का अंधियाला थोड़ा-थोड़ा छंट जाएगा । ये तुमसे किसने कहा मुझे अपना कुछ ग़म कम करना है ? मेरे सीने के… Read More मैं क्यों लिक्खूँ?
अपनी आदत से बाज़ आओ तुम इस क़दर प्यार मत लुटाओ तुम कई इनसान मुझमें छिपते हैं किस से मिलना है यह बताओ तुम याद तो रोज़ चली आती है भूले भटके ही चले आओ तुम
क्या बताऊँ कि मैं क्या से क्या हो गया इक तवायफ़ के पाज़ेब सा हो गया जिसको माना नहीं आज तक मर्द ने एक मजबूर औरत की ना हो गया
अपनी हद से गुज़र के देखूँगा अपनी किस्मत से लड़ के देखूँगा है मुहब्बत अदम की बरबादी फिर भी इक बार कर के देखूंगा
दुआ बाशक्ल सवाब ए जारिया खुदा करे कि नया साल इस क़दर गुज़रे मेरी पढ़ते हुए नमाज़ हर फजर गुजरे घनी जो छाँव तेरी रहमतों कि हो हम पर धूप का खौफ किसे हो जो यूं ज़ुहर गुजरे
मेरी मुश्किल पे मसखरी करता वह इनायत यही सही करता उसको मालूम भी नहीं होता और मैं उससे आशिक़ी करता हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल कोई हम पर भी शायरी करता
मैं कलंदर बन के तेरी याद में खो गया अपने दिल-ए-बर्बाद में दिल को ऐसा सा लगा था प्यार में कुछ बुरा होता नहीं संसार में
खुद को मिला हूँ मैं तेरी खैरात की तरह और लुट गया हूँ मैं मेरे जज़्बात की तरह मालूम है क़िस्मत में हमारे नहीं मगर मिलते भी नहीं हमको मुलाक़ात की तरह
कुछ वक़्त गुज़र सा जाने दो फिर याद मुझे तुम कर लेना सूरज को सर पर आने दो फिर याद मुझे तुम कर लेना है ढोंग हमारा रिश्ता अब तुम मानो या फिर ना मानो इस सच को घर कर जाने दो फिर याद मुझे तुम कर लेना