मुकम्मल

है ये जानता अह्द-ए-हाज़िर मुकम्मल नहीं वक़्त पर कोई क़ादिर मुकम्मल हमारे तशख्खुस को क्या पूछते हो न कामिल मुसलमां न काफिर मुकम्मल

अब के बरस

अब के बरस वतन का रहा हाल कुछ खराब आए न साथ ले के नया साल कुछ खराब दोज़ख़ में बैठ कर ये खयाल आए है अक्सर शायद रहे हों अपने भी आमाल कुछ खराब

Cacophony

“Chips and cold drinks, right?” “Yeah. Someone was supposed to come with the food, न?” “A was supposed to. I posted on the group.” “I wasn’t. No one told me.” “Come on. I posted on the group.” “You know मेरा net बंद रहता है । Couldn’t you have just called?”

नई सड़क पे

नई सड़क पे पुराने मकाँ सा लगता हूँ मैं टूटते हुए हिन्दोस्ताँ सा लगता हू कल मैं लगता था जिसे सारे जहाँ से अच्छा आज उस शख़्स को सारे जहाँ सा लगता हूँ

मैं क्यों लिक्खूँ?

तुम कहते हो लिख लेने से दिल का कुछ ग़म घट जाएगा, मेरा रोना सुनकर सुनने वालों का दिल फट जाएगा । तुम कहते हो लिख लेने से लम्बी रातें कट जाएंगी, लंबी रातों का अंधियाला थोड़ा-थोड़ा छंट जाएगा । ये तुमसे किसने कहा मुझे अपना कुछ ग़म कम करना है ? मेरे सीने के… Read More मैं क्यों लिक्खूँ?

कई इनसान मुझमें छिपते हैं

अपनी आदत से बाज़ आओ तुम इस क़दर प्यार मत लुटाओ तुम कई इनसान मुझमें छिपते हैं किस से मिलना है यह बताओ तुम याद तो रोज़ चली आती है भूले भटके ही चले आओ तुम