औक़ात ए खमसा

दुआ बाशक्ल सवाब ए जारिया खुदा करे कि नया साल इस क़दर गुज़रे मेरी पढ़ते हुए नमाज़ हर फजर गुजरे घनी जो छाँव तेरी रहमतों कि हो हम पर धूप का खौफ किसे हो जो यूं ज़ुहर गुजरे

हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल

मेरी मुश्किल पे मसखरी करता वह इनायत यही सही करता उसको मालूम भी नहीं होता और मैं उससे आशिक़ी करता हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल कोई हम पर भी शायरी करता

हमरक्स

मैं कलंदर बन के तेरी याद में खो गया अपने दिल-ए-बर्बाद में दिल को ऐसा सा लगा था प्यार में कुछ बुरा होता नहीं संसार में

खुद को मिला हूँ मैं तेरी खैरात की तरह

खुद को मिला हूँ मैं तेरी खैरात की तरह और लुट गया हूँ मैं मेरे जज़्बात की तरह मालूम है क़िस्मत में हमारे नहीं मगर मिलते भी नहीं हमको मुलाक़ात की तरह

फिर याद मुझे तुम कर लेना

कुछ वक़्त गुज़र सा जाने दो फिर याद मुझे तुम कर लेना सूरज को सर पर आने दो फिर याद मुझे तुम कर लेना है ढोंग हमारा रिश्ता अब तुम मानो या फिर ना मानो इस सच को घर कर जाने दो फिर याद मुझे तुम कर लेना