आज़ाद नज़्म का ढकोसला
A blank verse on the pretensions of poetry… Read More आज़ाद नज़्म का ढकोसला
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अपनी आदत से बाज़ आओ तुम इस क़दर प्यार मत लुटाओ तुम कई इनसान मुझमें छिपते हैं किस से मिलना है यह बताओ तुम याद तो रोज़ चली आती है भूले भटके ही चले आओ तुम
क्या बताऊँ कि मैं क्या से क्या हो गया इक तवायफ़ के पाज़ेब सा हो गया जिसको माना नहीं आज तक मर्द ने एक मजबूर औरत की ना हो गया
अपनी हद से गुज़र के देखूँगा अपनी किस्मत से लड़ के देखूँगा है मुहब्बत अदम की बरबादी फिर भी इक बार कर के देखूंगा
मेरी मुश्किल पे मसखरी करता वह इनायत यही सही करता उसको मालूम भी नहीं होता और मैं उससे आशिक़ी करता हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल कोई हम पर भी शायरी करता
कुछ वक़्त गुज़र सा जाने दो फिर याद मुझे तुम कर लेना सूरज को सर पर आने दो फिर याद मुझे तुम कर लेना है ढोंग हमारा रिश्ता अब तुम मानो या फिर ना मानो इस सच को घर कर जाने दो फिर याद मुझे तुम कर लेना