मैं क्यों लिक्खूँ?

तुम कहते हो लिख लेने से दिल का कुछ ग़म घट जाएगा, मेरा रोना सुनकर सुनने वालों का दिल फट जाएगा । तुम कहते हो लिख लेने से लम्बी रातें कट जाएंगी, लंबी रातों का अंधियाला थोड़ा-थोड़ा छंट जाएगा । ये तुमसे किसने कहा मुझे अपना कुछ ग़म कम करना है ? मेरे सीने के… Read More मैं क्यों लिक्खूँ?

खुद को मिला हूँ मैं तेरी खैरात की तरह

खुद को मिला हूँ मैं तेरी खैरात की तरह और लुट गया हूँ मैं मेरे जज़्बात की तरह मालूम है क़िस्मत में हमारे नहीं मगर मिलते भी नहीं हमको मुलाक़ात की तरह

Main kavi huuN jab tak jeevan hai tab tak mujhko likhnaa hogaa

मैं कवि हूँ जब तक जीवन है तब तक मुझको लिखना होगा चाहे जितनी बाधाएं हो शब्दों का भेद बताने में हर भावना के भीतर छिपती भावों से प्रेम निभाने में चाहे जीतने भी दिन बीतें मानी मतलब समझाने में मैं खुद ही डूबा रह जाऊं उलझन अपनी सुलझाने में मदिराओं का हालाओं का रस… Read More Main kavi huuN jab tak jeevan hai tab tak mujhko likhnaa hogaa