वो बिगड़ता है तो बिगड़ जाए

वो बिगड़ता है तो बिगड़ जाए ये बता दे कि दिल किधर जाए मेरा दिल है गले का हार नहीं ज़रा सी चोट पे बिखर जाए ज़रा सा दर्द तो होगा लेकिन ये दुआ है कि दिल ठहर जाए

कई इनसान मुझमें छिपते हैं

अपनी आदत से बाज़ आओ तुम इस क़दर प्यार मत लुटाओ तुम कई इनसान मुझमें छिपते हैं किस से मिलना है यह बताओ तुम याद तो रोज़ चली आती है भूले भटके ही चले आओ तुम

हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल

मेरी मुश्किल पे मसखरी करता वह इनायत यही सही करता उसको मालूम भी नहीं होता और मैं उससे आशिक़ी करता हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल कोई हम पर भी शायरी करता