फैज़ अहमद फैज़ के नाम
A tribute to Faiz’s everlasting Gulon mein rang bhare… Read More फैज़ अहमद फैज़ के नाम
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वो बिगड़ता है तो बिगड़ जाए ये बता दे कि दिल किधर जाए मेरा दिल है गले का हार नहीं ज़रा सी चोट पे बिखर जाए ज़रा सा दर्द तो होगा लेकिन ये दुआ है कि दिल ठहर जाए
है ये जानता अह्द-ए-हाज़िर मुकम्मल नहीं वक़्त पर कोई क़ादिर मुकम्मल हमारे तशख्खुस को क्या पूछते हो न कामिल मुसलमां न काफिर मुकम्मल
अब के बरस वतन का रहा हाल कुछ खराब आए न साथ ले के नया साल कुछ खराब दोज़ख़ में बैठ कर ये खयाल आए है अक्सर शायद रहे हों अपने भी आमाल कुछ खराब
वो तो खुश्बू है हवाओं में बिखर जाएगा होके हमसाये-सबा जाने किधर जाएगा मस’अला फूल का समझा था मगर ये पाया आख़िरश फूल भी कांटो सा नज़र आएगा
नई सड़क पे पुराने मकाँ सा लगता हूँ मैं टूटते हुए हिन्दोस्ताँ सा लगता हू कल मैं लगता था जिसे सारे जहाँ से अच्छा आज उस शख़्स को सारे जहाँ सा लगता हूँ
अपनी आदत से बाज़ आओ तुम इस क़दर प्यार मत लुटाओ तुम कई इनसान मुझमें छिपते हैं किस से मिलना है यह बताओ तुम याद तो रोज़ चली आती है भूले भटके ही चले आओ तुम
क्या बताऊँ कि मैं क्या से क्या हो गया इक तवायफ़ के पाज़ेब सा हो गया जिसको माना नहीं आज तक मर्द ने एक मजबूर औरत की ना हो गया
अपनी हद से गुज़र के देखूँगा अपनी किस्मत से लड़ के देखूँगा है मुहब्बत अदम की बरबादी फिर भी इक बार कर के देखूंगा
मेरी मुश्किल पे मसखरी करता वह इनायत यही सही करता उसको मालूम भी नहीं होता और मैं उससे आशिक़ी करता हम भी होते किसी की जान-ए-ग़ज़ल कोई हम पर भी शायरी करता