चलो, तुमको लेकर चलें

चलो, इंद्रधनुष के अंत तक चलें |
सुना है वहाँ परियाँ मटकियों में सोने के सिक्के छिपाती हैं,
वहाँ एक सपनों की दुकान करते हैं – हरे गुलाबी रजनीगंधा की खुशबू वाले दिन में टिमटिमाते सपने |
उनको कोई ग़रीबन  की बेटी बालों में जूड़े संग गूथ लेगी,
या कोई फकीरन का बच्चा आँसुओं संग खिचड़ी बना कर भूख मिटा लेगा |

चलो, समुद्र के अंतःकरण में |
सुना है वहाँ हंसों के चुगे मोती सीपियों में सजाए जाते हैं,
वहाँ जलपरियों से दोस्ती करते हैं – भोली भाली मक्खन सी मीठी मुस्कराहटों वाली दोस्ती |
उनको उपहार स्वरूप मोतियों की माला भेंट करेंगे,
और उनकी निशानी कुछ सुनहरे शंख और चाँदी की कौरियाँ जेबों में भर लेंगे |

चलो, किताबों की सैर करते हैं |
सुना है उनके पन्नों में ज़िंदगियाँ दफन होती हैं,
वहाँ कहानियों का मज़ार बनाएंगे – तुम्हारे आप से जन्मी और मेरे आप में जवान हुई कहानियाँ |
वक़्त आखिरी सिपारे पर आकर रुक गया होगा,
और हमारे वजूद को किसी पन्ने पर लिख कर क़लम की रुसनाई सूख चुकी होगी |

चलो, वक़्त का सफ़र तय करें,
सुना है यादों की रेलगाड़ी हँसी के शहर से आँसुओं के गांव तक जाती है,
उसपे चढ़कर बचपन के स्टेशन पर उतार जाएंगे – पढ़ाई से दो घंटे चुराकर आस पास और चोर पुलिस खेलने वाला सच्ची दोस्तियों का बचपन |
फिर अम्मी अब्बा से ज़िद करेंगे गर्मी की छुट्टियों में नानी के गांव चलने की,
और बर्फ के गोले बनवाएंगे मगर नए रंगों वाले |

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